मैं मूलतः शिक्षक हूँ. एक स्नातकोत्तर महाविद्यालय में तीन दशक तक अंगरेजी साहित्य पढ़ाने और बाद में ७-८ वर्षों तक वहीं प्राचार्य के रूप में कार्य के अपने अनुभव का ज़िक्र करते ही मुझे शिक्षकों के एक ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर की एक बात याद आ रही है. एक शिक्षक ने जब एक प्रोफ़ेसर को बताया कि उसका अनुभव १३ वर्ष का है तो प्रोफ़ेसर ने प्रश्न किया, "१३ वर्ष का अनुभव है अथवा आपने एक ही वर्ष के अनुभव को १३ बार दोहराया है?" पढ़ने-पढ़ाने के आज-जैसे माहौल में यह सवाल अटपटा नहीं है.
एक और घटना याद आ रही है. एक दिन क्लास में जाने से पहले मुझे स्टाफ रूम में किताब के पन्ने पलटता देखकर एक वरिष्ठ सहयोगी ने कहा, "पढ़ कर पढ़ाओगे तो पढ़ा नहीं पाओगे." तब मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने एक सीनियर की बात का मर्म समझ में आया. 'धर्मयुग’ में अपने परिचय में उन्होंने लिखा था, "रुचि अध्ययन, अरुचि अध्यापन".
शैक्षिक वातावरण से कुछ निराशा की मनःस्थिति में मैं इंडियन एक्सप्रेस के लिए भी काम करने लगा. बाद में हिन्दुस्तान टाइम्स से जुड़ा. लगभग 15 वर्षों तक प्राध्यापकी और पत्रकारिता दोनों की.
कवितायेँ पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है. कभी-कभी कवितायें लिख भी लेता हूँ.